Story
A2
पुरानी चिट्ठियों की एक सुबह
Translation: A Morning of Old Letters
सरोजी अपने दादा का ट्रंक साफ कर रही थी। वह ट्रंक दत्तक-पुत्र को देगी, इसलिए वह ठीक से देख रही थी।
ट्रंक में चिट्ठियाँ, टिकट और काली परतें बिखरी थीं। अचानक एक पीलिया सा कागज़ हाथ लगा, लिखा था 1940 के दशक का।
वो बैठ कर उसे पढ़ने लगी। चिट्ठी में मिट्टी की खुशबू और स्याही के धब्बे थे, और दादा ने लिखा था, "घर छोड़ने का डर और नई उम्मीदें दोनों साथ थीं।"
शब्द सुनकर सरोजी को उस दिन का बाजार, स्कूल और त्योहार याद आया। दादा ने कभी स्वतंत्रता के बारे में भी लिखा था, और मुश्किल समय की बात भी।
चिट्ठी बंद करते ही सरोजी का चेहरा बदल गया। उसने कहा, "मैं यह ट्रंक उसे दे दूँगी—ये हमारी पहचान है।"